 MUM preg copy1 8/4/2012 7:43:00 AM 14737
![/Portals/22/UltraPhotoGallery/4756/812/thumbs/55052.pregnancy3.jpg]() pregnancy3 8/4/2012 7:17:00 PM 14736
![/Portals/22/UltraPhotoGallery/4756/812/thumbs/55052.pregnancy2.jpg]() pregnancy2 8/4/2012 7:19:00 PM 14735
![/Portals/22/UltraPhotoGallery/4756/812/thumbs/55052.pregnancy.jpg]() pregnancy 8/4/2012 7:18:00 PM 14734
|
 |
|
|
 | |  |
 |
|
Special care during Pregnancy Months
|
 |
मासानुसार गर्भिणी परिचर्या :-
हर महीने में गर्भ - शरीर के अवयव व धातुएँ आकर लेती है, अंत: विकासक्रम के अनुसार मासानुमासिक कुछ विशेष आहार लेना चाहिए |
पहला महिना :
गर्भधारण का संदेह होते ही गर्भिणी सदा मिश्रीवाला सहज में ठंडा हुआ दूध उचित मात्र में पाचनशक्ति के अनुसार तीन घंटे के अंतराल से ले अथवा सुबह - शाम ले | इसके साथ सुबह १ चम्मच मक्खन में रूचि अनुसार मिश्री व काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर ले एवं हरे नारियल की चार चम्मच गिरी के साथ २ चम्मच सौंफ खूब देर तक चबाकर खाए | इससे बालक का शरीर पुष्ट, सुडौल व गौरवर्ण का होगा |
दूसरा महिना :
इसमे शतावरी, जीवन्ती, अश्वगंधा, मुलहठी, बला आदि मधुर औषधियों में से एक या अधिक का १ ग्राम चूर्ण २०० मिली दूध में २०० मिली पानी मिलाकर मध्यम आँच पर उबालते हुए पानी का भाग जल जाने पर सेवन करे | सवा महिना होने पर आश्रम द्वारा दी औषध से ३ मास तक पुंसवन कर्म करे |
तीसरा महिना :
इस महीने में दूध को ठंडा कर १ चम्मच शुध्द घी व ३ चम्मच शहद [ अर्थात घी व शहद विषम मात्रा में ] मिलकर सुबह - शाम ले | अनार का रस पीने तथा '' ॐ नमो नारायण" का जप करने से उलटी दूर होती है |
चौथा महिना :
इसमें प्रतिदिन २० से ४० ग्राम मक्खन को धोकर छाछ का अंश निकालकर मिश्री के साथ या गुनगुने दूध में डालकर अपनी पाचनशक्ति के अनुसार सेवन करे | इस मास में बालक का हृदय सक्रिय होने से वह सुनने - समजने लगता है | बालक की इच्छानुसार माता के मन में आहार - विहार संबंधी विविध इच्छाएँ उत्पन्न होने से उनकी पूर्ति युक्ति से [ अर्थात अहितकर न हो ] करनी चाहिए |
पांचवां महिना :
इस महीने से गर्भ में मस्तिष्क का विकास शुरू हो जाने से दूध में १५ से २० ग्राम घी ले या दिन में दाल - रोटी, चावल में ७ - ८ चम्मच घी ले | रात को १ से ७ बादाम [ अपने पाचनानुसार ] भिगो दे, सुबह छिलका निकाल के घोंटकर खाए व ऊपर से दूध पिये |
इस महीने के प्रारंभ से ही माँ को बालक के इच्छित धर्मबल, नीतिबल, मनोबल व सुसंस्कारों का अनन्य श्रध्दापूर्वक सतत मनन - चिंतन करना चाहिए | सत्संग व शास्त्र का भी मनन - चिंतन करना चाहिए |
छठा व सातवाँ महिना :
इन महीनो में दूसरे महीने की मधुर औषधियों में गोक्षुर चूर्ण का समावेश करे व दूध - घी से ले | आश्रम - निर्मित तुलसी - मूल की माला कमर में धारण करे | इस महीने से सूर्यदेव को जल चढ़ाकर उनकी किरणे पेट पर पड़े ऐसे स्वस्थता से बैठकर उँगलियों
पर नारियल तेल लगाकर बाहर से नाभि की ओर हल्के हाथो से मसाज करते हुए गर्भस्थ शिशु को संबोधित करते हुए कहे," जैसे सूर्यनारायण ऊर्जा, उष्णता, वर्षा देकर जगत का कल्याण करते है, वैसे तू भी ओजस्वी, तेजस्वी व परोपकारी बनना | माँ के स्पर्श से बच्चा आनंदित होता है | बाद में २ मिनट तक निम्न मंत्रो का उच्चारण करते हुए मसाज चालू रखे |
ॐ भूर्भुव: स्व: | तत्सवितुर्वरेन्यं भर्गो देवस्य धीमहि | धियो यो न: प्रचोदयात ||
रामो राजमणि: सदा विजयते राम रमेश भजे, रामेनाभिदता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: |
रामान्नास्ति परायण परतरं रामस्य दसो स्म्यहं, रमे चित्तलय: सदा भवतु में भो राम मामुध्दर ||
रामरक्षास्तोत्र के उपर्युक्त श्लोक में ' र ' का पुनरावर्तन होने से बच्चा तोतला नहीं रहता | पिता भी अपने प्रेम भरे स्पर्श के साथ गर्भस्थ शिशु को प्रशिक्षित करे |
सातवें मास में स्तन, छाती व पेट पर त्वचा के खिंचने से खुजली शुरू होने पर ऊँगली से न खुजलाकर देशी गाय के घी की मालिश करनी चाहिए |
आठवां व नौवा महिना :
इन महीनो में चावल को ६ गुना दूध व ६ गुना पानी में पकाकर घी डालकर सुबह - शाम खाए अथवा शाम के भोजन में दूध - दलिया में घी डालकर खाए | शाम का भोजन तरल रूप में लेना जरुरी है |
गर्भ का आकार बढने पर पेट का आकार व भार बढ़ जाने से कब्ज व गैस की शिकायत हो सकती है | निवारणार्थ निम्न प्रयोग अपनी प्रकृति के अनुसार करे |
आठवें महीने के १५ दिन बीत जाने पर २ चम्मच एरण्ड तेल दूध से सुबह १ बार ले, फिर नौवे महीने की शुरुआत में पुन: एक बार ऐसा करे अथवा त्रिफला चूर्ण, इसबगोल इनमे से जो भी चूर्ण प्रकृति के अनुकूल हो उसका सेवन वैद्यकीय सलाह के अनुसार करे |
पुराने मल की शुद्धि के लिए अनुभवी वैद्य द्वारा निरुह बस्ति व अनुवासन बस्ति ले
चंदनबला लाक्षादी तेल से पीठ , कटी से जंघाओं तक मालिश करे और इसी तेल में कपडे का फाहा भिगोकर रोजाना रात को सोते समय योनि के अन्दर गहराई में रख लिया करे | इससे योनिमार्ग मृदु बनता है और प्रसूति सुलभ हो जाती है |
पंचामृत : १ चम्मच ताज़ा दही, ७ चम्मच दूध, २ चम्मच शहद, १ चम्मच घी व १ चम्मच मिश्री को मिला लो | इसमें १ चुटकी केसर भी मिलाना हितावह है | ९ महीने नियमित रूप से यह पंचामृत ले |
गुण : यह शारीरिक शक्ति, स्फूर्ति, स्मरणशक्ति व कांति को बढाता है तथा हृदय, मस्तिष्क आदि अवयवों को पोषण देता है | यह तीनो दोषों को
संतुलित करता है व गर्भिणी अवस्था में होनेवाली उलटी को कम करता है |
उपवास में सिंघाड़े व राजगरे की खीर का सेवन करे | इस प्रकार प्रत्येक गर्भवती स्त्री को नियमित रूप से उचित आहार - विहार का सेवन करते हुए नवमास चिकित्सा विधिवत लेनी चाहिए ताकि प्रसव के बाद भी उसका शरीर सशक्त, सुडौल व स्वस्थ बना रहे, साथ ही वह स्वस्थ, सुडौल, सुन्दर और हृष्ट - पुष्ट शिशु को जन्म दे सके | यह चिकित्सा लेने पर सिजेरियन डिलीवरी की नौबत नहीं आयेगी | प्रसूति के समय नर्स, डॉक्टर ओपरेशन की बात करे तो मना कर दे | गाय के गोबर का १० से ११ मिली रस [ भगवन्नाम जपकर ] लेने से सिजेरियन डिलीवरी की नौबत
नहीं आती | संत श्री आशारामजी बापू के उपदेश का लाभ लेनेवाले कई परिवारों के जीवन में यह लाभ देखा गया है |
|
|
|
|
|
 |
 | |  |
|
|
|
 | |  |
 |
|
बच्चा जन्मे तब
|
 |
बच्चा जन्मे तब  बच्चा जन्मे तब
जब शिशु पैदा होए तो उस समय ...... माताएँ मन में ‘ॐ ॐ ॐ परमात्मने नम:’ जपते हुये बच्चे को भूमध्य पर स्पर्श करे | बड़ा हितकारी है |
New born baby
When a new born baby arrives, ... mothers should recite AUM AUM AUM PARMATMANE NAMAH and touch the spot between his eyebrows. This will later be highly beneficial for the baby.
- Pujya Bapuji Ahemdabad 12th Jan' 2013
Listen Audio
Click-Here-To-Download
View Details: 1992 
|
|
|
|
|
 |
 | |  |
|
 | |  |
 |
|
Special Article
|
 |
सगर्भावस्था के दौरान आचरण :-
१. सगर्भावस्था में गर्भिणी अपानवायु, मल, मूत्र, डकार, छींक, प्यास, भूख, निद्रा,खांसी, थकान की श्वास, जम्हाई, अश्रु आदि आयुर्वेद में बताए गए १३ वेगों को न रोके |
२. सख्त व टेढ़े आसन पर बैठना, पैर फैलाकर और झुककर ज्यादा समय बैठना वर्जित है |
३. प्रथम तीन व अंतिम दो मास यात्रा न करे | अन्य महीनो में भी ऐसा यात्रा करे, जिसमे शरीर की हिलचाल ज्यादा न हो |
४. चुस्त व गहरे रंग के कपडे न पहने |
५. दिन में नींद व रात्रि को जागरण न करे | दोपहर को विश्रांति ले पर गहरी नींद वर्जित है
६. अप्रिय बात न सुने व वाद - विवाद में न पड़े | मन में उद्वेग उत्पन्न करनेवाले विभस्त दृश्य, टीवी सीरियल न देखे व ऐसे साहित्य पढ़े - सुने नहीं सगर्भावस्था के दौरान समागम सर्वथा वर्जित है |
७. मैले, विकलांग या विकृत आकृति के व्यक्ति, रजस्वला स्त्री, रोगी एवं हीन शरीरवाले का स्पर्श न करे |
८. दुर्गंधयुक्त स्थान पर न रहे तथा इमली के वृक्ष के नजदीक न जाये|
९. जोर जोर से न बोले और गुस्सा न करे |
१०. सीधे न सोकर करवट बदल - बदलकर सोये | घुटने मोड़कर न सोये |
११. शरीर के सभी अंगो को सौम्य कसरत मिले, इस प्रकार घर के कामकाज करते रहना चाहिए |
१२. दर्द निवारक ( पेनकिलर ) व नींद की गोलियों का सेवन न करे |
१३. कुछ देर तक शुद्ध हवा में टहलना लाभदायक है |
१४. अधिक चाय-कॉफी पीनेवाली महिलाओं की गर्भधारण की क्षमता कम होती है। गर्भवती स्त्री अधिक चाय पीती है तो नवजात शिशु को जन्म के बाद नींद नहीं आती।
१५. मांस का सेवन न करें:- व्यापारिक लाभ की दृष्टि से पशुओं का वजन बढ़ाने के लिए उन्हें अनेक रासायनिक मिश्रण खिलाये जाते हैं। इन्ही मिश्रणों में से एक का नाम है डेस(डायथिस्टिल-बेस्ट्राल)। इस मिश्रण को खाने वाले पशु के मांस के सेवन से गर्भवती महिला के आनेवाली संतान को कैन्सर हो सकता है।
सगर्भावस्था में निषिध्द आहार :-
१. गर्भ रहने पर किसी भी प्रकार के आसव जैसे की कुमारी आसव न ले |
२. इडली, डोसा, ढोकला जैसे खामिरयुक्त, पित्त्वर्धक तथा चीज, पनीर जैसे पचने में भारी पदार्थ न खाए |
३. बिस्कुट, केक, नुडल्स ( चाइनीज ), भेलपुरी, दहिबदा, गोलगप्पे, आदि मैदे की वस्तुए न खाकर शुध्द घी व आटे से बनी स्वास्थप्रद वस्तुओ का सेवन करे |
४. कोल्डड्रिंक्स व फलों के डिब्बाबंद रस की जगह ताजा नींबू या आवलेका शरबत ले |
५. मांसाहार - मछली, अंडे अदि का सेवन कदापि न करे |
चरकाचार्य ने बताया है
१. मधुर रस : का सतत सेवन करने से बच्चे को डायबिटीस, गूंगापन, स्थूलता हो सकती है
२. अम्ल : इमली, टमाटर, खट्टा दही, डोसा, इस्ट वाले पदार्थ आती प्रमाण में खानेसे बच्चे को जन्म से ही नक् में से खून बहना, त्वचा व आँखों के रोग हो सकते है
३. लवन ( नमक ) : ज्यादा नमक लेने से बच्चे के बाल अकाल सफ़ेद होते है, गिरते है गंजापन आता है, त्वचा करचली युक्त बनती है
४. तीखे : पदार्थ लेने बच्चा कमजोर प्रकृति का क्षीण शुक्रधातु वाला व भविष्य में प्रजोत्पदन में असमर्थ हो सकता है |
५. कड़वे : बच्चा शुष्क, कम वजन का व कमजोर हो सकता है
६. कषाय : अती खाने पर श्यावता आती है उर्ध्ववायु की तकलीफ रहती है |
सारांश यही की स्वाद के कारण अतिश्योक्ति न करके संतुलित आहार ले |
ठीक नहीं प्रसव में पेन किल्लर :-
पेनकिल्लर वे दवाइयाँ हैं, जिनसे पेन (दर्द) की खबर देने वाले ज्ञानकोष मूर्च्छित हो जाते हैं और कुछ समय के लिए दर्द का एहसास नहीं होता।
वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रसव की पीड़ा को कम या खत्म करने के लिये ली जानेवाली पेनकिल्लर दवाइयाँ माँ और शिशु के सम्बंध को नुकसान पहुँचाती हैं। स्टॉकहोम में किये गये एक अध्ययन के अनुसार माँ द्वारा ली गय़ी पेनकिल्लर नवजात शिशु को सामान्य रूप से स्तनपान करने से रोकती है। शोधकर्ताओं ने सामान्य प्रसव द्वारा जन्मे ऐसे 28 नवजात शिशुओं की विडियो फिल्म बनायी, जिन्हें नहला-धुलाकर माँ के पास स्तनपान के लिए रखा गया था। इन शिशुओं को जन्म देने वाली महिलाओं में से 18 महिलाएँ ऐसी थीं, जिन्होंने प्रसव पीड़ा से बचने के लिए पेनकिल्लर का प्रयोग किया था, जबकि शेष ने प्रसव-पीड़ा को सहकर अपने शिशुओं को जन्म दिया था।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन माताओं ने पेनकिल्लर नहीं ली थीं, उनके शिशुओं का व्यवहार स्तनपान के दौरान बिल्कुल सामान्य था। जब इन शिशुओं को उनकी माताओं के पास पहुँचाया गया तो उन्होंने माँ से लाड़ (स्नेह) जताने के बाद जन्म के आधे घंटे के भीतर ही स्तनपान शुरु कर दिया। परंतु जिन महिलाओं ने पेनकिल्लर ली थें, उनके शिशुओं ने उनके पास आने पर किसी प्रकार की भावनाओं का प्रदर्शन नहीं किया या फिर लगभग 15 मिनट में एक या दो बार ही वे माँ के प्रति आकर्षित हुए। इनमें से करीब आधे शिशुओं ने जन्म के बाद पहले करीब ढाई घंटों में न तो स्तनपान किया और न ही स्तनपान की कोशिश ही की।
इसी शोध में यह तथ्य भी प्रकाश में आया कि जिन महिलाओं ने पेनकिल्लर नहीं ली थीं, उनमें ऑक्सीटोसिन की मात्रा उस प्रत्येक मौके पर बढ़ जाती थी जब शिशु स्तनपान करता या फिर उससे स्नेह प्रदर्शित करता था। ऑक्सीटासिन वह मातृत्व हार्मोन है जो माँ और शिशु के बीच स्नेह समबन्ध को मजबूत बनाता है। जो माताएँ प्रसव के दौरान पेनकिल्लर लेती हैं, उनके शरीर में ऑक्सीटासिन का स्राव नहीं होता, जिससे माँ और शिशु के बीच स्नेह-सम्बन्ध विकसित होने में बाधा पड़ती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पेनकिल्लर शिशु को जन्म लेते समय चेतनाशून्य या स्तब्ध कर देती हैं और यही कारण है कि वे प्रारंभिक क्षणों में माँ से अपने को जुड़ा हुआ नहीं पाते।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अंक 79 वर्ष 7, पृष्ठ संख्या 15
|
|
|
|
|
 |
 | |  |
|
|
|
|
|